देवता का न्याय
‘नीचे शोर सुनाई दे रहा है प्रभु,’
देवता ने आंखें खोली- ‘मैं देख रहा हूं उनके लिए काम की व्यवस्था कर दो।’ कहकर देवता तपस्या में लीन हो गए।
खेती की व्यवस्था हो गई, पृथ्वी फलों-फूलों की हरियाली से भर गई। कुछ सालों बाद,
‘नीचे शोर सुनाई दे रहा है प्रभु,’
देवता ने आंखें खोली,-‘इनकी मन की शांति के लिए पूजा की व्यवस्था कर दो,’ कहकर वे ध्यानस्थ हो गये।
फिर पूरी दुनिया सुंदर इमारतों से सज गई।
कुछ समय बाद,
‘नीचे शोर सुनाई दे रहा है प्रभु’
देवता ने आंखें खोली, थोड़ा सोचते हुए कहा-‘इन्हें बीमारियों और मृत्यु का डर दो।’ कहकर वे दुखी हुए। युद्ध और बीमारी के डर से घबराहट फैल गई, लेकिन लोगों में सद्भावना जगी। आपसी प्रेम भाव जगता दिखाई दिया लेकिन फिर कुछ दिनों बाद फिर वही क्षीण स्वर सुनाई दिया, ‘नीचे शोर सुनाई दे रहा है प्रभु’ लोग बड़े शहरों में रहते हैं प्रभु पर भी!
देवता ने आंखें नहीं खोली और कहा,-जब तक इनके पेट खाली थे ये सब थोड़ा कम लड़ते थे लेकिन अब सभी बड़े शहरों की ओर दौड़ रहे हैं जहां जमीन, घर, और अपनेपन के लिए तरसते लोग हैं। तंग गलियों में बड़े सपने पलते हैं, आंखें हरियाली के लिए तरसती हैं, और मन दूसरों के निर्मल प्रेम के लिए, इन्हें और शहर बनाने दो ‘और फिर बुदबुदाए, ‘अब दूसरी दुनिया बनानी होगी,’ आदमी को बनाने का औचित्य खत्म हो गया है ‘आंख बंद करके देवता ने कहा ‘-जिस हृदय में करूणा नहीं है उनके रहने का कोई अर्थ नहीं है।’

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