“दीवार में एक खिड़की रहती थी” उपन्यास की कथावस्तु
विनोद कुमार शुक्ला: एक परिचय
विनोद कुमार शुक्ला का जन्म 1 जनवरी 1937 को मध्य प्रदेश के राजनांदगांव में हुआ था। उनका पहला कविता संग्रह “लगभग जय हिंद” पहचान सीरीज के अंतर्गत 1971 में प्रकाशित हुआ था। उनका दूसरा कविता संग्रह “वह आदमी चला गया नया गर्म कोट पहन कर” 1979 में प्रकाशित हुआ। “नौकर की कमीज” (1979) उनका पहला उपन्यास है। 1988 में प्रकाशित कहानी संग्रह “पेड़ पर कैमरा” भी उनकी श्रेष्ठतम कृतियों में से एक है। उनकी रचनाओं का मराठी, उर्दू, मलयालम, जर्मन और अंग्रेजी भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
पुरस्कार एवं सम्मान
- मध्य प्रदेश शासन की गजानन माधव मुक्तिबोध फैलोशिप (1975-76)
- कविता संग्रह के लिए मध्य प्रदेश कला परिषद का रजा पुरस्कार (1981)
- “नौकर की कमीज” को मध्य प्रदेश साहित्य परिषद का वीर सिंहदेव पुरस्कार
- उड़ीसा की वर्णमाला संस्था द्वारा सृजनभारती सम्मान (1979-80)
- रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (1992)
- “सब कुछ होना बचा रहेगा” कविता संग्रह को भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार (1992)
- मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान (1995)
‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ की कथावस्तु
विनोद कुमार शुक्ला द्वारा रचित “दीवार में एक खिड़की रहती थी” उपन्यास हिंदी साहित्य की श्रेष्ठ कृति है। यह उपन्यास अपने नए तरीके के अनूठेपन के साथ प्रस्तुत होता है। उपन्यास पढ़ने से पहले पाठक को किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त होना आवश्यक है। इसमें पारंपरिक कथा, रोचक प्रसंग या ऐसा अंत नहीं मिलेगा, जो आरंभ से धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। पाठक इस उपन्यास को पढ़ते समय किसी रोचक जीवन का भ्रमण नहीं करता, बल्कि साहित्य के माध्यम से जीवन के सत्य से परिचित होता है और एक नए संसार में प्रवेश करता है। लेखक ने कई शैलियों का चयन किया है, जिससे यह उपन्यास नवीन शैली में परिचित जीवन से एक निराली दुनिया की ओर ले जाता है, जिसका माध्यम एक खिड़की बनती है।
दीवार की खिड़की की जादुई दुनिया
यह उपन्यास सभी पूर्वाग्रहों को छोड़ने पर अद्भुत हो जाता है। यह छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव के निवासी विनोद कुमार शुक्ला के गांव की पृष्ठभूमि पर आधारित है। लेखक स्वयं को उस गांव में अपने कस्बे के करीब पाते हैं। सरल, सहज जीवन और प्रकृति ही इस उपन्यास का कथ्य है। व्यक्ति का मन जिस सहजता से सदैव आकर्षित रहा है, वह जीवन की समस्याओं का अनुभव कर पुनः उसी सहजता में लौट जाना चाहता है। यह सहजता उसे प्रकृति से अपने रिश्तों में, आचार-व्यवहार में मिल जाती है। सामान्य से लगने वाले क्रियाकलापों में भी यह सहजता दिखाई देती है। साहित्य हमें रोचकता, सजीवता एवं रोमांच के साथ कई नए तथ्यों को समाहित कर जीवन के सत्य से जोड़ता है। इसी संदर्भ में लेखक इस उपन्यास में सहजता एवं सरलता से जीवन के सार्वभौमिक सत्य का वर्णन करते हैं। इस उपन्यास में इसी सत्य का सहज चित्रण हमारे पारंपरिक एवं सांस्कृतिक जीवन की गरिमा के साथ व्यक्त किया गया है।
उपन्यास के पात्र दीवार के पार जाकर किसी जादुई दुनिया में प्रवेश करते हैं, किंतु उस जादुई दुनिया में भी वही तालाब और पेड़ हैं, जो उन्हें अपने घर के आसपास दिखाई देते हैं। उस जादुई दुनिया में जादुई कुछ भी नहीं है, बस एक स्वतंत्रता और खुशी है, जो प्रकृति के निकट जाकर और अपने आप में संतुष्ट रहकर मिलती है। अपने जीवन के अभाव से दूर, दो व्यक्ति वहां सदैव प्रसन्न रहते हैं। एक दीवार के बीच बनी खिड़की के पार एक जादुई दुनिया है, जो केवल खिड़की को पार कर मिल जाती है, लेकिन कई लोग अपनी दुनिया में इतने व्यस्त रहते हैं कि चाहकर भी वे इसमें प्रवेश नहीं कर सकते।
रघुवर प्रसाद और सोनसी का जीवन
एक निम्न वर्गीय व्यक्ति का जीवन ही इस उपन्यास का केंद्र है, जहां अभाव, लालसा, संकोच जैसी किसी भी भावना के लिए कोई स्थान नहीं है। रघुवर प्रसाद एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखते हैं। वह एक महाविद्यालय में व्याख्याता हैं और ₹800 पाते हैं। महाविद्यालय पूरे गांव में है, जो उनके गांव से 8 किलोमीटर की दूरी पर है। रघुवर प्रसाद थोड़े काले, 22-23 साल के सुंदर नौजवान हैं। उनके परिवार में उनकी पत्नी सोनसी, माता-पिता और छोटा भाई हैं। माता-पिता दूसरे गांव में रहते हैं, लेकिन कभी-कभी बेटे की छोटी सुंदर गृहस्थी देखने आते रहते हैं।
रघुवर प्रसाद अपने घर से महाविद्यालय ऑटो में जाते हैं, मगर एक दिन उन्हें एक युवा साधु मिलता है, जो उन्हें हाथी पर बिठाकर महाविद्यालय ले जाता है। कम वेतन में भी रघुवर प्रसाद संतुष्ट जीवन जीते हैं। उनके विभागाध्यक्ष पूछते हैं कि वह कॉलेज कैसे आते हैं, क्योंकि उनके पास साइकिल नहीं है। रघुवर प्रसाद छोटे से घर में रहते हैं और खुश हैं। उनके घर की दीवार पर एक खिड़की है। बच्चे उस खिड़की से झांकने के लिए नीचे की तरफ एक के ऊपर एक ईंटें रखते हैं। आधी टूटी ईंटों से बच्चे गिर न जाएं, इसलिए रघुवर प्रसाद अच्छी ईंटें बिछा देते हैं।
सोनसी और रघुवर प्रसाद उस खिड़की से दूसरी तरफ जाते हैं, दीवार के दूसरी ओर नदी, झरने, पेड़ से भरपूर प्राकृतिक वातावरण है, जहां वे घंटों समय बिताते हैं, मेड़ों पर चलते हैं, तालाब में नहाते हैं और वहां एक बुढ़िया रहती है, जो उन्हें गरम-गरम चाय देती है। इस दुनिया में वे उन्मुक्त रहते हैं और फिर खिड़की से अंदर आ जाते हैं। जब कभी माता-पिता और छोटा भाई इनके घर आते हैं, तो वे सब घर के एक ही कमरे में खुश रहते हैं। थोड़े दिन बाद हर दिन हाथी की सवारी होती है।
रघुवर प्रसाद के महाविद्यालय में विभागाध्यक्ष हैं, वे रघुवर प्रसाद का जीवन देखते हैं। वे भी दीवार की खिड़की के पार जाना चाहते हैं, लेकिन किन्हीं कारणों से वे अपने परिवार को वहां नहीं ले जा पाते। वे बाहर से ही खिड़की के पार की दुनिया देखना चाहते हैं, परंतु वह उन्हें दिखाई नहीं देती। वे सदैव साइकिल की चिंता से त्रस्त रहते हैं। कम आमदनी में भी रघुवर प्रसाद का संतुष्ट जीवन देखकर वे असहज हो जाते हैं। चपरासी, सोनसी और उसका छोटा भाई भी हाथी को लेकर उत्साहित हैं। रघुवर प्रसाद अपनी मां और पिताजी को पैसे भेजा करते हैं।
एक दिन अचानक साधु चला जाता है और रघुवर प्रसाद हाथी की जंजीर खोल देते हैं। सोनसी थोड़े दिनों के लिए अपने मायके जाती है। रघुवर प्रसाद उन्हीं जगहों पर खुद को पाते हैं, जहां सोनसी और उन्होंने अच्छा समय बिताया था। उन्हें सोनसी की याद आती है, लगता है कि सभी सोनसी की राह देख रहे हैं। सोनसी आते समय रघुवर प्रसाद के पिताजी की दी हुई साइकिल लेकर आती है और उसे बाहर छोड़कर सो जाती है। रघुवर प्रसाद को देर रात में पता चलता है कि साइकिल बाहर रह गई है। वे उठकर देखते हैं, साइकिल बाहर ही रहती है, वे उसे अंदर रखकर सो जाते हैं। सुबह विभागाध्यक्ष कॉलेज जाते समय बाहर रखी साइकिल देखकर सोचते हैं कि कोई साइकिल लावारिस तो छोड़ नहीं गया।
रघुवर प्रसाद और बच्चा
रघुवर प्रसाद के घर से रोड तक जाने के रास्ते में एक नीम का पेड़ है, जिसके ऊपर हमेशा एक बच्चा बैठा रहता है। रघुवर प्रसाद उससे पूछते हैं कि हाथी आया या नहीं। वह बच्चा अपने पिता के डर से हमेशा पेड़ पर ही बैठा रहता था। उसे बीड़ी पीते देख उसका बाप पीटता था। वह अपने घर के बाहर रखी डंडी को देख समझ जाता था कि उसका बाप घर में है, तब वह घर नहीं जाता था। उसका बाप राउत था, घर-घर जाकर दूध निकालता था और गाय-भैंस चराता था। बाप जानता था कि उसके रहते लड़का कभी घर नहीं आएगा, इसलिए वह ज्यादा से ज्यादा समय बाहर रहने का प्रयत्न करता था।
रघुवर प्रसाद और सोनसी एक दिन उस बच्चे को खाना खाने के लिए घर बुलाते हैं। कमरे में खटिया के पीछे बच्चे का बाप छुपा बैठा रहता है और उसे देखता रहता है। उसके बाद वह उसे अपने पास बिठाकर खाना खिलाता है, उसके बालों में कंघी करता है। अपने हिस्से की जलेबी भी बेटे के दोने में डालकर उसे खाते देखकर खुश होता है। बाप-बेटे में सुलह हो जाती है। उसी दिन से वह लड़का बीड़ी पीना बंद कर देता है।
‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास की शाब्दिक सुंदरता
उपन्यास के कई प्रसंग बड़ी ही आत्मीयता लिए हुए हैं। रघुवर प्रसाद जब अपनी खिड़की से बच्चों को झांकते देखते हैं, तो कहते हैं कि “ब में ऊ की मात्रा बुड़िया” और वह कहती है “नहीं, ग में ऊ की मात्रा गुड़िया”, कहकर बच्ची शरमा कर चली जाती है। इसी प्रकार सोनसी और रघुवर प्रसाद मन ही मन बातें किया करते थे। वह लड़का जो नीम के पेड़ पर बैठकर बीड़ी पीता है, उसे देखकर आने के बाद सोनसी कहती है कि वह वहां नहीं है, अर्थात पेड़ पर नहीं है। फिर रात के सन्नाटे में “नहीं है” यह बात इस हद तक जाती है कि एक आदमी था, जो अपने घर के बाहर बैठा है और स्वाभाविक तौर पर वह बोल पड़ता है “कौन नहीं है?”
रघुवर प्रसाद के पिता बाहर जाते समय एक झोला जरूर साथ लेकर निकलते कि जरूरत की चीज सस्ती मिल जाए तो खरीद लेंगे, लेकिन पैसे भूल जाते हैं। यहां लेखक कहते हैं कि “देख लेने से वस्तुओं को पा जाने का सुख मिल जाता तो कितना अच्छा होता, मिठाई को देखते ही खाने का सुख ऐसा होता तो दिखाने के लिए थोड़ी चीजें होती और सबकी जरूरत पूरी हो जाती। अनजानी खुशी सोच-समझकर हुए दुख को दूर कर देती है।”
इस उपन्यास में सास और बहू के रिश्ते में भी आत्मीयता दिखाई देती है। सोनसी के प्रति रघुवर प्रसाद की मां और खिड़की के पार की बुढ़िया का व्यवहार ग्रामीण रिश्तों की सुंदरता को दर्शाता है। रघुवर प्रसाद और सोनसी के प्रेम को दिखाते समय लेखक चांद, जुगनू की बातें करते हैं और सभी घटनाएं पाठक को उन दोनों के प्रेम और समर्पण को सहज ही समझा देती हैं। लेखक इस उपन्यास के द्वारा एक ऐसी खिड़की की तलाश करते हैं, जो सभी के लिए आवश्यक है। एक खिड़की हमें जीवन की समस्याओं के बीच शांत व सुकून भरा जीवन जीने का नया रास्ता दिखाती है। जैसे हम जीवन जीते हैं, वहां वह सभी संभावनाएं रहती हैं, जिनकी हमें तलाश रहती है, किंतु न तो हमारी भावनाएं, न ही हमारी संवेदनाएं हमें उनके प्रति सचेत होना सिखाती हैं। इसलिए पास होते हुए भी व्यक्ति किसी दूसरी ही दुनिया में जीता है, जो उसके पसंद की नहीं है। पसंद का जीवन और जो वह जीवन जीता है, दोनों के बीच केवल एक खिड़की ही होती है और व्यक्ति जीवन भर उस खिड़की के पार जा नहीं पाता, क्योंकि वह इसी कोशिश में लगा रहता है कि जहां वह है, वहां सुकून मिल जाए, जो वह कर रहा है, वहां सब कुछ ऐसा हो, जो उसका मनचाहा हो। लेकिन जीवन की अपनी शर्तें हैं, सभी चीजें साथ आती हैं और उन्हें संभालना व्यक्ति के लिए मुश्किल होता है।
विनोद कुमार शुक्ला की कल्पना और जीवन
लेखक की यह दीवार की खिड़की केवल एक कल्पना या सपना नहीं है। मन ही मन बात करने की कला कोई रोचक दुनिया नहीं है, यह केवल कुछ संवेदनाओं से परिपूर्ण जीवन है, जो हमारे पास के व्यक्तियों और समस्याओं से जूझते हुए हमें यह सिखा सकता है कि सद्भावना और संवेदनाएं जीवन को आसान कर देती हैं। लेखक ने भारतीय गांवों व कस्बों के सादे जीवन की सौंधी खुशबू से हमें परिचित कराया है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि लेखक ने इस उपन्यास में दूर-दराज के गांवों के निराले रूप को नई शैली में व्यक्त किया है। इस उपन्यास में जीवन में कल्पना दिखाई देती है और कल्पना में जीवन, दोनों अपने आप में इस तरह घुले-मिले से लगते हैं कि जीवन क्या है और कल्पना क्या, यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है। लेकिन फिर भी अपने नीरस जीवन में रंग भरने के लिए दीवार की खिड़की एक माध्यम बनती है। इस खिड़की के पार जीवन की नीरसता को खत्म करने के कई उपाय हैं। आपसी प्रेम और सद्भाव ही इस संसार का प्रथम नियम बन जाता है, इसलिए इस खिड़की के पार जाने पर सोनसी और रघुवर प्रसाद एक दूसरी दुनिया में पहुंच जाते हैं, जो न केवल उनके रिश्तों को मजबूत करता है, बल्कि जीवन जीने के नए तरीकों का भी अन्वेषण करता है।
This novel and the highlights and objectives were so good and so intrested to study .
Overall was so cool and I was waiting to read more these novels